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Saturday, 20 September 2025

मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार

 भारत सरकार अधिनियम 1919, जिसे मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है, ब्रिटिश भारत में संवैधानिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था।


प्रमुख विशेषताएँ

1. मोंटेगू घोषणा: 1917 में एडविन मोंटेगू (ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) ने भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार के विकास की घोषणा की।

2. द्वैध शासन (Dyarchy): प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली शुरू की गई।

    - आरक्षित विषय: कानून, वित्त, पुलिस जैसे विषय गवर्नर के अधीन रहे।

    - हस्तांतरित विषय: शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए।

3. विधायी परिषदों का विस्तार: केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

4. निर्वाचित प्रतिनिधित्व: अधिक निर्वाचित सदस्यों की व्यवस्था।

5. सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व: मुसलमानों, सिखों आदि के लिए पृथक निर्वाचक मंडल।

6. प्रांतीय स्वायत्तता: प्रांतों को कुछ सीमित स्वायत्तता।

7. गवर्नर की शक्तियाँ: प्रांतीय गवर्नर को विशेष शक्तियाँ।

8. सचिवालय सुधार: प्रशासनिक संरचना में कुछ परिवर्तन।

9. लोक सेवा आयोग: भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान।

10. बजट प्रक्रिया: बजट पर कुछ नियंत्रण भारतीय सदस्यों को दिया गया।


द्वैध शासन (Dyarchy)

- प्रांतीय स्तर पर: प्रांतों में द्वैध शासन लागू हुआ।

- विषयों का विभाजन: आरक्षित और हस्तांतरित विषय।

- गवर्नर की भूमिका: गवर्नर महत्वपूर्ण शक्ति रखता था।

- भारतीय मंत्रियों की भूमिका: हस्तांतरित विषयों पर भारतीय मंत्रियों का नियंत्रण।

- आलोचना: द्वैध शासन को जटिल और असफल माना गया।


महत्व और प्रभाव

- संवैधानिक विकास: भारत में संवैधानिक विकास की दिशा में कदम।

- भारतीय भागीदारी: भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ी।

- सीमित स्वायत्तता: सीमित स्वायत्तता का प्रावधान।

- असंतोष: कई भारतीय नेताओं में असंतोष।

- आगे के सुधारों का मार्ग: 1935 के अधिनियम की ओर कदम।

- राष्ट्रीय आंदोलन: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव।


प्रमुख व्यक्ति और संदर्भ

- एडविन मोंटेगू: ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया।

- लॉर्ड चेम्सफोर्ड: भारत के वायसराय।

- महात्मा गांधी: अधिनियम के प्रति असंतोष।

- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: अधिनियम के प्रति मिश्रित प्रतिक्रिया।

- मुस्लिम लीग: सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर जोर।


आलोचना और परिणाम

- अपर्याप्त सुधार: कई लोगों ने इसे अपर्याप्त माना।

- द्वैध शासन की जटिलता: द्वैध शासन को जटिल और असफल माना गया।

- असंतोष और आंदोलन: असहयोग आंदोलन (1920-22) जैसे आंदोलनों का संदर्भ।

- आगे के सुधार: 1935 के भारत सरकार अधिनियम की ओर प्रगति।

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