भारत सरकार अधिनियम 1919, जिसे मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है, ब्रिटिश भारत में संवैधानिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था।
प्रमुख विशेषताएँ
1. मोंटेगू घोषणा: 1917 में एडविन मोंटेगू (ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) ने भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार के विकास की घोषणा की।
2. द्वैध शासन (Dyarchy): प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली शुरू की गई।
- आरक्षित विषय: कानून, वित्त, पुलिस जैसे विषय गवर्नर के अधीन रहे।
- हस्तांतरित विषय: शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए।
3. विधायी परिषदों का विस्तार: केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
4. निर्वाचित प्रतिनिधित्व: अधिक निर्वाचित सदस्यों की व्यवस्था।
5. सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व: मुसलमानों, सिखों आदि के लिए पृथक निर्वाचक मंडल।
6. प्रांतीय स्वायत्तता: प्रांतों को कुछ सीमित स्वायत्तता।
7. गवर्नर की शक्तियाँ: प्रांतीय गवर्नर को विशेष शक्तियाँ।
8. सचिवालय सुधार: प्रशासनिक संरचना में कुछ परिवर्तन।
9. लोक सेवा आयोग: भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान।
10. बजट प्रक्रिया: बजट पर कुछ नियंत्रण भारतीय सदस्यों को दिया गया।
द्वैध शासन (Dyarchy)
- प्रांतीय स्तर पर: प्रांतों में द्वैध शासन लागू हुआ।
- विषयों का विभाजन: आरक्षित और हस्तांतरित विषय।
- गवर्नर की भूमिका: गवर्नर महत्वपूर्ण शक्ति रखता था।
- भारतीय मंत्रियों की भूमिका: हस्तांतरित विषयों पर भारतीय मंत्रियों का नियंत्रण।
- आलोचना: द्वैध शासन को जटिल और असफल माना गया।
महत्व और प्रभाव
- संवैधानिक विकास: भारत में संवैधानिक विकास की दिशा में कदम।
- भारतीय भागीदारी: भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ी।
- सीमित स्वायत्तता: सीमित स्वायत्तता का प्रावधान।
- असंतोष: कई भारतीय नेताओं में असंतोष।
- आगे के सुधारों का मार्ग: 1935 के अधिनियम की ओर कदम।
- राष्ट्रीय आंदोलन: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव।
प्रमुख व्यक्ति और संदर्भ
- एडविन मोंटेगू: ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया।
- लॉर्ड चेम्सफोर्ड: भारत के वायसराय।
- महात्मा गांधी: अधिनियम के प्रति असंतोष।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: अधिनियम के प्रति मिश्रित प्रतिक्रिया।
- मुस्लिम लीग: सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर जोर।
आलोचना और परिणाम
- अपर्याप्त सुधार: कई लोगों ने इसे अपर्याप्त माना।
- द्वैध शासन की जटिलता: द्वैध शासन को जटिल और असफल माना गया।
- असंतोष और आंदोलन: असहयोग आंदोलन (1920-22) जैसे आंदोलनों का संदर्भ।
- आगे के सुधार: 1935 के भारत सरकार अधिनियम की ओर प्रगति।
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