प्रबन्ध के सिद्धांत || प्रबंधन के हेनरी फेयोल के चौदह सिद्धांत | Fayol’s Principles of Management
चलिए
आज
प्रबंध
के
सिद्धांतों
पर चर्चा
करते
हैं सबसे
पहले
प्रबंध
के
सिद्धांत
का
अर्थ
समझ
लेते
हैं
प्रबंध के सिद्धांत का अर्थ : - ‘ प्रबंध के सिद्धांत प्रबंधक के व्यवहार के लिए विस्तृत एवं सामान्य दिशा निर्देश होते हैं |’
अब यह जान लेते हैं कि प्रबंध के सिद्धांतों का उद्गम कैसे हुआ - प्रबंध के सिद्धांतों का उद्गम हम दो प्रकार से समझ सकते हैं -
1.
अवलोकन
के
आधार
पर
- इस
पद्धति
में
प्रबंधक
बार-बार उत्पन्न होने वाली किसी समस्या तथा उसके कारणों को गहराई से देखता है तथा उस समस्या का सर्वश्रेष्ठ समाधान खोजता है जोकि प्रबंध का सिद्धांत बन जाता है |
2.
प्रयोगात्मक
अध्ययन
के
आधार
पर
- इस
पद्धति
में
प्रबंध
के
सिद्धांत
को
खोजने
के
उद्देश्य
से
शोधकर्ता
द्वारा
प्रयोगात्मक
अध्ययन
किया
जाता
है|
प्रबंध के सिद्धांत की प्रकृति - प्रबंध के सिद्धांतों की प्रकृति निम्न प्रकार से हैं |
1.
सार्वभौमिक
सत्य -
सार्वभौमिक
से
अभिप्राय
यह
है
कि
प्रबंध
के
सिद्धांतों
की
आवश्यकता
व्यावसायिक
एवं
व्यावसायिक
सभी
प्रकार
के
क्षेत्र
में
समान
रूप
से
होती
है |
2. सामान्य
मार्ग
निर्देशन - प्रबंध
के
सिद्धांत
सामान्य
मार्गदर्शन
के
रूप
में
होते
हैं
एवं
इनका
से
लागू
नहीं
किया
जा
सकता |
3. लोचशीलता - गतिशील
प्रकृति
के
होते
हैं
ये
स्थिर
प्रकृति
के
नहीं
होते बल्कि
परिवर्तनशील
होते
हैं|
4. अनिश्चित - प्रबंध
के
सिद्धांत
चित्र
नहीं
होते
जो
परिस्थितियों
का
प्रभाव
पड़ता
है
अतः
परिस्थितियों
के
अनुसार
इन
को
लागू
करना
या
न करना
प्रबंधक
का
निर्णय
में
हो
सकता
है|
प्रबंध
के
सिद्धांतों
का
महत्व
- प्रबंध के सिद्धांतों का महत्व निम्न प्रकार से है -
1.
प्रबंधको
का
उपयोगी
ज्ञान - प्रबंध
के
सिद्धांत
प्रबंधकों
को
यह
बताते
हैं
कि
विभिन्न
परिस्थितियों
में
से
काम
करना
चाहिए
ताकि
पहले
से
निर्धारित
देशों
को
प्राप्त
किया
जा
सके
तथा
पहले
से
की
गयी
गलतियों
को दोबारा
ना
दोहराया
जा
सके |
2.
संसाधनों
का
अनुकूलतम
उपयोग - प्रबंध
के
सिद्धांतों
का
पालन
करने
से
संगठन
के
सभी
संसाधनों (Man , Money ,
Material , Machine ) का
अनुकूलतम
उपयोग
संभव
हो
पाता
है |
3.
वैज्ञानिक
अथवा
संतुलित
निर्णय - प्रबंध
के
सिद्धांत
प्रबंधकों
के
लिए
प्रशिक्षण
का
भी
कार्य
करतें
हैं|
इनकी
सहायता
से
प्रबंधक
भूल
एवं
सुधार
विधि
को
ना
बनाते
हुए
संतुलित
निर्णय
ले
पाते
हैं|
4.
बदलते
वातावरण
की
आवश्यकताओं
को
पूरा
करना -
और
व्यावसायिक
तारीख
को
बदलते
वातावरण
के
साथ
खुद
को
उसे
बदलना
पड़ता
है|
प्रबंध
के
सिद्धांत
प्रबंधकों
को
इस
चुनौती
का
सामना
करने
योग्य
बनाते
हैं |
प्रबंध के
आधारभूत
सिद्धांत
फ्रांस
के
प्रसिद्ध
उद्योगपति
हेनरी
फ्योल ने
अपनी
पुस्तक जर्नल
एंड
इंडस्ट्रियल
मैनेजमेंट
में
प्रबंध
के 14 सिद्धांतों
का
वर्णन
किया
है| हेनरी फ्योल का जीवनकाल
1841 से
1925 तक
रहा| चलिए प्रबंध के 14 सिद्धांतों
पर
चर्चा
करते
हैं -
प्रबंध
के
14 सिद्धांत
1.
कार्य
विभाजन
- इस सिद्धांत के
अनुसार
पूरा
कार्य
छोटे-छोटे भागों में बांट देना चाहिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और रूचि के अनुसार कार्य का एक भाग ही सौपना चाहिए |
इस
सिद्धांत
का
धनात्मक प्रभाव
यह
रहता
है
कि प्रबंधक
को
विशिष्टीकरण
के
लाभ
प्राप्त
होते
हैं तथा
कर्मचारियों
की
कुशलता
में
भी
वृद्धि
होती
है |
वहीं
अगर
प्रबंधक
इस
सिद्धांत
को
नहीं
अपनाता
है तो
मैं
तो
उसे
विशिष्टीकरण के
लाभ
प्राप्त
होंगे
और
ना
ही
कर्मचारियों
की
कार्यकुशलता
में
वृद्धि
होगी|
2.
अधिकार
एवं
उत्तरदायित्व
- इस
सिद्धांत
के
अनुसार
जब
किसी
व्यक्ति
को
कोई
कार्य
सौपा
जाता
है
और
उस
कार्य
के
प्रति
हम
उसे
उत्तरदायी
भी
ठहराना
चाहते
है
तो
हमें
उसे
उस
कार्य
से
सम्बंधित
पर्याप्त
अधिकार
भी
देने
चाहिए | इस
सिद्धांत
का
घनात्मक
प्रभाव
यह
रहता
है
कि
यह
लक्ष्य
प्रप्ति
में
सहायक
होता
है
वही
कर्मचारियों
के
साहस
में
भी
वृद्धि
होती
है | वही
दूसरी
ओर
इस
सिद्धांत
के
अभाव
में
अधिकारों
के
गलत
प्रयोग
का
डर
बना
रहता
है
और
कर्मचारियों
के
साहस
में
भी
कमी
आती
है
|
3.
अनुशासन
- जैसा कि आप सभी जानते हैं अनुशासन ही किसी भी कार्य के सफलता की नीव होती है फेयोल
के
अनुसार
‘ अनुशासन
से
अभिप्राय
आज्ञाकारिता
, अधिकारों के प्रति श्रद्धा तथा निर्धारित नियमों का पालन करने से है
|’ प्रबंध
के
तीनों
स्तरों
पर
अच्छी
पर्यवेक्षण
व्यवस्था
प्रदान करके, नियमों
की स्पष्ट
व्याख्या
करके
एवं
पुरस्कार
व दंड
पद्धति
को
लागू
करके
अनुशासन
स्थापित
किया
जा
सकता
है|
धनात्मक
प्रभाव
में
कह
सकते
हैं
कि
अनुशासित
संस्था
की साख लोगों
की
नजर
में
अच्छी
होती
है,
कर्मचारियों
की
कुशलता
में
वृद्धि
होती
है
और
बेहतर
श्रम
प्रबंध
संबंध
बनते
हैं|
वहीं
अगर
हम
अवहेलनात्मक प्रभाव
की
बात
करें
तो
संस्था
के
साथ
तथा
कर्मचारियों
के
कुशलता
में
कमी
आ जाती
है
अव्यवस्था
का
बोलबाला
हो
जाता
है
और
अविश्वास
का
वातावरण
बन
जाता
है|
4.
आदेश की एकता - प्रबंध
के
चौथे
सिद्धांत
के
अनुसार
कर्मचारी
को
एक
बार
में
केवल
एक
ही
अधिकारी
से
आदेश
मिलने
चाहिए
और
वह
कर्मचारी
भी
उसी
अधिकारी
के
प्रति
उत्तरदायी
होना
चाहिए |
एक
कर्मचारी
को
यदि
आदेश
देने
वाले
कई
अधिक
कर्मचारी
होंगे
तो
वह
समझ
ही
नहीं
पाएगा
कि
किसके
आदेश
को
वह
पहले
माने
इससे
वह
अपने
आप
को
भ्रमित
महसूस
करेगा | इससे
कर्मचारियों
की
कार्यकुशलता
में
कमी
आ जाएगी
और अधिकारी
अहम
के
चलते
उनमें
झगड़े
की
संभावना
भी
बन
सकती
है|
इस
स्थान
के
धनात्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
बात
करें
तो
अधीनस्थों
के
लिए
भ्रमित
स्थिति
पैदा
नहीं
होती,
अधीनस्थों
की
कार्य
कुशलता
में
वृद्धि
होती
है,
अधिकारियों
की
भी
कार्य
कुशलता
में
वृद्धि
होती
है,
उत्तरदेयता
निर्धारण
करने
में
आसानी
होती
है
और
वातावरण
भी
अच्छा बन
जाता
है |
वहीं
दूसरी
ओर
अवहेलनात्मक प्रभाव की
बात
करें
तो
अधीनस्थों
के
लिए
भ्रम
की
स्थिति
पैदा
होती
है
कार्यकुशलता
में
कमी
आती
है
अवस्था
का
बोलबाला
मिलेगा
और
लड़ाई
झगड़े
होने
के
भी
मौके
रहेंगे
क्योंकि
अधीनस्थों
को
एक
से
अधिक
आदेश
मिले
होंगे
कार्य
करने
के
और
प्रत्येक
अधिकारी
चाहेगा
कि
उसका
कार्य
पहले
किया
जाए|
5.
निर्देश की एकता - पांचवें सिद्धांत
का
अभिप्राय
यह
है
कि
क्रियाओं
के
प्रत्येक
समूह
के
लिए
जिनका
की
एक
जैसा
उद्देश्य
हो
एक
ही
अध्यक्ष
और
एक
ही
योजना
होनी
चाहिए| कहने
का
तात्पर्य
है
कि
एक
जैसे
उद्देश्य
वाली
विभिन्न
क्रियाओं
के
समूह
के
लिए
एक
ही
कार्य
योजना
होनी
चाहिए
और
उन्हें
नियंत्रण
करने
वाला
भी
एक
ही
अधिकारी
होना
चाहिए
जैसे
किसी
कारखाने
में
अनेक
विभाग
होते
हैं
तो
प्रत्येक
विभाग
की
अलग
योजना
होनी
चाहिए
और
प्रत्येक
विभाग
को
संभालने
वाला
अलग-अलग अधिकारी होना चाहिए “ हेनरी
फयोल
ने
कहा
है
कि
एक
संगठन के
कुशलता
पूर्वक
संचालन
के
लिए
निर्देश
की
एकता
अत्यंत
महत्वपूर्ण
है
जबकि
कर्मचारियों
की
कुशलता
बढ़ाने
के
लिए
आज
देश
की
एकता
महत्वपूर्ण
है “ |
अब
इसके
धनात्मक
प्रभाव
की
चर्चा
कर
लेते
हैं
यहां
हमें
विशिष्ट
करण
के
लाभ
प्राप्त
हो
जाते
हैं
संगठन
की
कार्य
कुशलता
में
वृद्धि
हो
जाती
है
साथ
ही
साथ
यह
उद्देश्य
प्राप्ति
में
भी
आसानी
पैदा
करते
हैं
वही
अवहेलनात्मक प्रभाव कि
अगर
हम
बात
करें
तो
विदेशी
करण
के
लाभ
नहीं
मिल
पाते
कार्यकुशलता
में
कमी
आती
है
और
सबसे
जरूरी
उद्देश्य
प्राप्ति
में
कठिनाई
होती
है|
6.
व्यक्तिगत हित सामान्य हित के अधीन - इस
सिद्धांत
को
व्यक्तिगत
हित
पर
सामान्य
हित
को
प्राथमिकता
के
नाम
से
भी
जाना
जा
सकता
है| सामान्य हित अथवा संस्था के हित ही सर्वोपरि होते हैं एक प्रबंधक को कई निर्णय लेने से व्यक्तिगत रूप से हानि होती है लेकिन संस्था को भारी लाभ होता है तो संस्था के लाभ को प्राथमिकता देने वाला निर्णय
ही
लेना
चाहिए | इसके
विपरीत
यदि
प्रबंधक
को
व्यक्तिगत
लाभ
होता
हो
लेकिन
संस्था
को
हानि
होती
हो
तो
ऐसा
निर्णय
कभी
भी
नहीं
लेना
चाहिए
इसके
धनात्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
बात
करें
तो
मानवता
का
पालन
संस्था
के
लाभ
से
सभी
को
लाभ, संस्था उद्देश्यों की प्राप्ति और व्यक्तिगत और संस्थागत उद्देश्य दोनों में आपस में समन्वय होता है |
वही
अवहेलनात्मक
प्रभाव
में
मानवता
का
हनन
ईर्ष्या
में
वृद्धि
संस्था
के
उद्देश्यों
को
प्राप्त
करने
में
रुकावट
इत्यादि
का
सामना
करना
पड़
सकता
है|
7.
कर्मचारियों का पारिश्रमिक- हेनरी फयोल
का
मानना
है
कि
कर्मचारियों
को
दिया
जाने
वाला
परिसर
में
उचित
होना
चाहिए
ताकि
कर्मचारियों
व मालिकों
दोनों
को
ज्यादा
से
ज्यादा
संतुष्टि
मिल
सके|
अतः
प्रबंधक
यह
सुनिश्चित
करें
कि
सभी
को
कार्य
के
अनुसार
योग्यता
के
अनुसार
पारिश्रमिक
दिया
जा
रहा
हो| यदि कर्मचारियों को उनकी सेवाओं का उचित पारिश्रमिक मिलता रहेगा तो वह अपनी पूरी क्षमता लगन और ईमानदारी से कार्य करेंगे अन्यथा इन लाभों से हमें वंचित होना पड़ेगा| किसी भी कर्मचारी के पारिश्रमिक में कुछ तत्व शामिल होते हैं जैसे जीवन स्तर की लागत,
श्रमिकों
की
मांग,
उनकी
योग्यता
इत्यादि| हेनरी फयोल
का
मानना
है
कि
कर्मचारियों
को
अभिप्रेरित
करने
के
लिए
पारिश्रमिक
के
अतिरिक्त
मौद्रिक
एवं
मौद्रिक
प्रेरकों
का
भी
प्रयोग
लगातार
किया
जाना
चाहिए| अगर
हम
धनात्मक
प्रभाव
की
चर्चा
करें
तो
इससे
कर्मचारियों
के
प्रोत्साहन
और
संतुष्टि
में
वृद्धि
होती
है,
समर्पण
भावना
का
विकास
होता
है
और
श्रम
परिवर्तन
दर
में
भी
कमी
आ जाती
है
मतलब
कर्मचारी
हमारी
फैक्ट्री
को
छोड़कर
नहीं
जाते
हैं|
अवहेलनात्मक
प्रभाव
में
प्रधान
की
कमी
और
ए संतुष्टि
में
वृद्धि
होगी
बेईमानी
को
बढ़ावा
मिलेगा
और
श्रम
परिवर्तन
में
तेजी
आ जाएगी|
8.
केंद्रीयकरण तथा विकेन्द्रीकरण
- आठवें सिद्धांत
के
अनुसार
अधिकारियों
को
चाहिए
कि
पूर्ण
केंद्रीय
करण
और
पूर्ण
विकेंद्रीकरण
के
स्थान
पर
प्रभावपूर्ण
केंद्रीय
करण
को
अपनाएं| हेनरी फयोल
के
अनुसार
प्रभावपूर्ण
केंद्रीय
करण
का
अभिप्राय
यह
नहीं
है
कि
अधिकारों
को
पूर्ण
रूप
से
केंद्रित
कर
दिया
जाए,
बल्कि
उनका
मानना
यह
है
कि
महत्वपूर्ण
निर्णय
लेने
का
अधिकार
अधिकारियों
को
अपने
पास
रखने
चाहिए
जबकि
दैनिक
वह
कम
महत्वपूर्ण
निर्णय
लेने
के
अधिकार अधीनस्थों
को
सौंप
देनी
चाहिए | केंद्रीय
करण
व विकेंद्रीकरण
का
अनुपात
व्यवसाय
की
स्थिति
पर
निर्भर
करता
है
जैसे
छोटे
व्यापार
में
केंद्रीय
करण
और
बड़े
व्यापार
में
विकेंद्रीकरण
की
मात्रा
अधिक
रखने
से
लाभ
होगा|
धनात्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
बात
करें
तो
इससे
अधिकारियों
के
कार्य
भार
में
कमी
आती
हैं,
बेहतर
और
शीघ्र
निर्णय
लिए
जा
सकते
हैं
और
अधीनस्थों
के
प्रोत्साहन
में
भी
वृद्धि
होती
है |
अवहेलनात्मक
प्रभाव
में
बात
करें
तो
अधिकारियों
के
कार्य
भाग
में
अनावश्यक
वृद्धि
हो
जाती
है
जिससे
वह
उतावलापन
में
गलत
निर्णय
ले
सकते
हैं
और
अधीनस्थों
के
प्रोत्साहन
में
कमी
आने
के
मौके
हो
जाते
हैं|
9.
सोपान श्रंखला
- श्रंखला का अभिप्राय एक औपचारिक अधिकार रेखा से है जो उच्चतम अधिकारी से निमंत्रण अधिकारी तक एक सीधी रेखा में चलती है|
हेनरी
फयोल
के
विचार
के
अनुसार
इस
श्रंखला
का
सख्ती
से
पालन
किया
जाना| अधिकारों व संदेशवाहन की अधिक
भ्रष्ट
व्यवस्था
होने
के
कारण
समस्याओं
को
शीघ्रता
से
हल
किया
जा
सकता
है|
समतल
संपर्क
सोपान
श्रंखला के
सिद्धांत
का
अपवाद
है|
इस
अवधारणा
का
विकास
आकस्मिकता के
समय
समान
स्तर
के
कर्मचारियों
द्वारा
सीधा
संपर्क
स्थापित
करने
के
लिए
किया
गया
ताकि
संदेशवाहन
में
देरी
ना
हो|
धनात्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
चर्चा
करें
तो
सूचनाओं
का
व्यवस्थित
प्रवाह
होता
है,
अधिकारों
के
पूर्ण
आदर्श
से
बेहतर
संबंध
स्थापित
होते
हैं
तथा
समस्याओं
का
अति
शीघ्र
हल
हो
जाता
है|
वहीं
दूसरी
ओर
अवहेलनात्मक
प्रभाव
की
बात
करें
तो
सूचनाओं
का
अव्यवस्थित
परवाह
होने
लगता
है
नजदीकी
अधिकारियों
को
अनदेखा
करने
से
संबंध
बिगड़ने
लगते
हैं
और
सूचनाएं
समय
पर
ना
मिलने
से
समस्याओं
में
वृद्धि
हो
जाती
है|
10.
व्यवस्था या क्रमबद्धता
- इस सिद्धांत के अनुसार सही व्यक्ति को सही कार्य पर ही लगाना चाहिए और सही वस्तु को सही स्थान पर रखा जाना चाहिए कर्म बदलता का मतलब आप सभी जानते भी हैं एक के बाद 2 के
बाद 3 दिन
के
बाद
चार यह
कर्म
इसी
प्रकार
चलता
है|
हेनरी फयोल
के
अनुसार
प्रत्येक
उपक्रम
में
दो
अलग-अलग व्यवस्थाएं जरूर होनी चाहिए भौतिक साधनों के लिए भौतिक व्यवस्था और मानवीय साधन के लिए सामाजिक व्यवस्था |
भौतिक
साधनों
को
व्यवस्थित
करने
का
अर्थ
यह
हुआ
कि
हर
वस्तु
के
लिए
एक
उचित
स्थान
होना
चाहिए
और
हर
वस्तु
उसे
उचित
स्थान
पर
रखनी
चाहिए | वही
मानवीय
साधनों
की
अगर
हम
बात
करें
तो
हर
व्यक्ति
के
लिए
एक
स्थान
होना
चाहिए
और
हर
व्यक्ति
को
उसी
निश्चित
स्थान
पर
कार्य
करना
चाहिए| अगर
हम
इस
व्यवस्था
को
लागू
कर
लेते
हैं
तो
हर
कर्मचारी
को
यह
पता
होगा
कि
उसे
कहां
कार्य
करना
है
और
उसे
अपनी
जरूरत
की
वस्तुएं
कहां
पर
मिलेंगे| धनात्मक
प्रभावों
की
अगर
हम
बात
करें
तो
भौतिक
संसाधनों
वह
मानव
शक्ति
का
प्रभावशाली
उपयोग
हो
सकेगा
वही
समय
की
बर्बादी
नहीं
होगी
और
सबसे
बड़ी
बात
बेहतर
अनुशासन
हो
सकेगा| अवहेलना
त्मक
प्रभाव
की
अगर
हम
बात
करें
तो
संसाधनों
का
दुरुपयोग , दुर्घटनाओं
की
संभावना
में
वृद्धि
और
अव्यवस्था
का
बोलबाला
हो
जाएगा |
11.
समता -
समता
का
सिद्धांत
यह
बताता
है
कि
प्रबंधकों
को
अपने
कर्मचारियों
के
साथ
व्यापार
करते
समय
न्याय
एवं
उदारता
का
प्रदर्शन
करना
चाहिए| इससे
कार्य
के
प्रति
समर्पण
भावना
एवं
अपनेपन
की
भावना
का
संचार
होता
है |
किसी
भी
कर्मचारी
के
प्रति
पक्षपातपूर्ण
व्यवहार
कभी
नहीं
करना
चाहिए
सभी
के
साथ
एक
जैसा
व्यवहार
होना
चाहिए| स्कूल
के
अनुसार
यदि
एक
कर्मचारी
बहुत
अच्छा
कार्य
करता
है
और
दूसरा
कर्मचारी
कामचोर
परिवर्ती
का
है
तो
दोनों
के
साथ
एक
जैसा
व्यवहार
नहीं
होना
चाहिए
बल्कि
दूसरे
के
साथ
निश्चित
रूप
से
सख्त
रवैया
अपनाया
जाना
जरूरी
हो
जाता
है
ऐसा
ना
करना
ही
अपने
आप
में
समता
होगा |
धनात्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
बात
करें
तो
कर्मचारियों
के
संतुष्टि
समर्पण
भावना
कार्य
कुशलता
में
वृद्धि
इस
तरह
के
गुण
हमें
मिल
जाते
हैं
वहीं
अवहेलना
त्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
बात
करें
तो
संतुष्टि
संगठन
के
प्रति
अविश्वास, कार्यकुशलता
में
कमी, लापरवाही इत्यादि बढ़ जाती है |
12.
कर्मचारियों में स्थायित्व
- प्रबंध के बारे में सिद्धांत के अनुसार कर्मचारियों में स्थायित्व बना रहना चाहिए ताकि कार्य व्यवस्थित रूप से चलता रहे मतलब कर्मचारियों को दिन प्रतिदिन नहीं बदलना चाहिए|
हेनरी
फेयोल
का
मत
है
कि
कर्मचारियों
के
कार्यकाल
में
अस्तित्व
बुरे
प्रबंध
की
निशानी
है और
इसके
परिणाम
भी
अच्छे
नहीं
होते|
ऊंची
श्रम
परिवर्तन
दर
से
कर्मचारियों
को
बार
बार
चुने
जाना
उनको
प्रशिक्षण
देने
से
लगते
भी
बढ़ा
देता
है |
तथा
सबसे
जरूरी
बात
कंपनी
की
साख
में
कमी
आती
है
कर्मचारियों
में
अनिश्चितता
का
भाव
पैदा
करती
है|
धनात्मक
प्रभाव
कि
अगर
हम
बात
करें
तो
कर्मचारियों
में
विश्वास
में
वृद्धि
होती
है, संस्था के साथ में वृद्धि होती है, कर्मचारियों का संस्था के प्रति धनात्मक झुकाव
होता
है
और
प्रशिक्षण
की
लागत
है
अभी
घट
जाते
हैं |
अवहेलना
तमक
प्रभाव
में
अविश्वास
का
वातावरण, संस्था
के
साख में
कमी, अच्छे कर्मचारियों का संस्था छोड़कर चले जाना और प्रशिक्षण लागतो को बढ़ाना हो सकता है|
13.
पहल क्षमता
- इस सिद्धांत के अनुसार अपने विचारों को प्रकट करते हुए कार्य करने की क्षमता से है |
हेनरी
फयोल
के
अनुसार
प्रबंधक
का
कर्तव्य
है
कि
वह
अपने
कर्मचारियों
में
अधिकारों
की
सीमा
तथा
अनुशासन
के
अंतर्गत
रहते
हुए
किसी
कार्य
को
करने
या
निर्णय
लेने
से
पहले
करने
की
भावना
को
प्रेरित
करें |
अधिनस्थ
अपने
नए
और
उपयोगी
विचार
जब
प्रस्तुत
करने
लगेंगे
तो
वे
धीरे-धीरे संगठन के अभिन्न अंग बन जाएंगे |
धनात्मक
प्रभाव
की
चर्चा
करें
तो
कर्मचारियों
की
सोच
शक्ति
में
वृद्धि
होती
है ,
समर्पण
भावना
में
वृद्धि
होती
है
इत्यादि|
14.
सहयोग की भावना - इस
सिद्धांत
के
अनुसार
प्रबंधक
को
लगातार
कर्मचारियों
में
टीम
भावना
के
विकास
का
प्रयास
करते
रहना
चाहिए | ऐसा
करने
के
लिए
प्रबंधक
को
कर्मचारियों
से
बातचीत
के
दौरान
मैं
के
स्थान
पर
हम
शब्द
का
प्रयोग
ज्यादा
से
ज्यादा
करना
चाहिए| जैसे
हम
इस
कार्य
को
अच्छे
ढंग
से
करेंगे
ना
कि
मैं
इस
कार्य
को
अच्छे
ढंग
से
करूंगा| गुणात्मक
प्रभावों
की
चर्चा
करें
तो
इससे
टीम
भावना
बढ़ती
है
उद्देश्यों
की
प्राप्ति
में
आसानी
हो
जाती
है
और
मधुर
संबंध
बनने
लगते
हैं,
अवहेलना
तमक
प्रभाव
में
टीम
भावना
उत्पन्न
नहीं
हो
पाती,
उद्देश्य
प्राप्ति
में
कठिनाई
होती
है
और
संबंधों
में
कड़वाहट
उत्पन्न
हो
जाती
है|
निष्कर्ष
- निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि प्रबंध का संबंध मानव से होने के कारण इसमें कुछ भी अंतिम नहीं कहा जा सकता|
किन
सिद्धांतों
को
किस
समय
और
किस
परिस्थिति
में
कितनी
मात्रा
में
प्रयुक्त
किया
जाए,
यह
प्रबंधक
के
कार्य
कुशलता
अनुभव
और
निर्णय शक्ति
पर निर्भर
करता
है
और
हेनरी
फयोल
के
इन 14 सिद्धांतों
में
लोचशीलता
का
तत्व
विद्यमान
है|
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